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Articles - स्थायी अर्थव्यवस्था के प्रणेता - जे. सी. कुमारप्पा

गॉंधीजी उनके एक से बढ़कर एक साथियों से संपन्न थे| उनमें एक नाम उभरकर सामने आता है, जे. सी. कुमारप्पा का| विदेश में पढ़े वहॉं की जीवनशैली में पले-बड़े कुमारप्पा, गॉंधीजी से मिलते ही उनके शिष्य बन गये| गॉंधीजी की पहली मुलाकात का रंग ऐसा लगा की केवल पोशाक ही नहीं बल्कि जीवनशैली भी बदल गयी| गॉंधीजी ने उन्हें ऊेलींेी ेष ऊर्ळींळपळींू का सम्मान दे दिया| कुमारप्पा ने महात्मा गॉंधी के आर्थिक विचारों को एक वैज्ञानिक आत्मा के साथ व्याख्यायित किया| १९२९-१९३१ के दौरान गुजरात विद्यापीठ में पढ़ाया और गॉंधीजी की गैर-मौजूदगी में यंग इण्डिया का सम्पादन कार्य भी किया| गॉंधीजी के पास से कुमारप्पा ने न केवल खादी धारण की, बल्कि आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत भी लिया| वे गॉंधी दर्शन के वाहक बन गए| जे.सी. कुमारप्पा एक बहुसर्जक रचनाकार थे और उन्होंने गॉंधीवादी अर्थशास्त्र में अपनी उमदा शैली में कई किताबें लिखी| कुमारप्पा की १२५ वीं जन्म जयंती के अवसर पर खोज गॉंधीजी की के पाठकों के लिये प्रस्तुत है यह विशेष लेख|- सम्पादक

जे. सी. कुमारप्पा एक प्रशिक्षित चार्टर्ड एकाउंटेंट थे| अपने गहन ज्ञान के द्वारा उन्होंने गॉंधीजी के भौतिक विश्लेषण में अर्थव्यवस्था के सिद्धांत की कल्पना की| इसके आधार पर उन्होंने एक महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखा जिसे स्थायी अर्थव्यवस्था (एलेपेाू ेष झशीारपशपलश) कहा गया, इसे अहिंसक अर्थव्यवस्था भी कहा जाता है| यह जीवन के व्यवहार संबंधी रिश्ते को अनुकूलित करता है, ताकि जीवन को अपने सबसे अच्छे रूप में प्रस्थापित किया जा सके| इससे मनुष्य और बाकी जीव-सृष्टि के बीच सद्भाव बनाये रखने में सरलता बनाये रहता है| गॉंधीवादी आर्थिक विचार कुमारप्पा के जीवन का असामान्य हिस्सा रहा| वे जीवन को ऐसी पद्धति से संगठित करने का प्रयास कर रहे थे, मानो जीवन का रक्षण, संरक्षण और समर्थन प्राप्त करने के लिये सहज रूप से प्रयास कर सके|१

मूल विश्वास

कुमारप्पा कहते हैं, सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों में अटल विश्वास ने गॉंधीजी के आर्थिक विचार की नींव प्रस्थापित की|२ ‘सत्य ही ईश्वर है’ यह गॉंधीजी की मूलभूत श्रद्धा थी| जिसका अस्तित्व है वह है सत्य| जीवन का अस्तित्व ही सत्य की सबसे करीबी अभिव्यक्ति है’| सत्य का अहसास जीवन के माध्यम से ही संभव है, यानी कि जीवन की यथार्थता यही है| सत्य और जीवन के बीच पूरक संबंध हैं| इसलिए गॉंधीजी ने अनुमान लगाया कि, जीवन को उन्नत करना सत्य का हिस्सा हैं और जीवन का अस्वीकार करना असत्य हैं|३

सत्य की उनकी खोज ने मानव की अपरिहार्य एकता को महसूस करने का नेतृत्व किया| गॉंधीजी के लिए, सामूहिक जीवन सत्य प्राप्ति का सार था| सत्य के लिए उनकी खोज ने उसे समाज में, सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं में और इसके प्रणालियों और संरचनाओं में तलाशने के लिए निर्दिष्ट किया|

जीवन की अर्थव्यवस्था

इस मूल धारणा का पालन करते हुए, जे सी कुमारप्पा ने अर्थव्यवस्था को सत्य और अहिंसा को प्रतिबिंब बनाने का प्रयास किया, ताकि एक-दूसरे के स्थान की अवहेलना किए बिना समाज के सभी सदस्यों के लिए समान उपाय संभव बना सके|४

यदि जीवन प्राथमिक है, तो जीवन की जरूरतों को पूरा करने वाली अर्थव्यवस्था जीवन के अनुरूप होना जरूरी है| इसकी व्याख्या करने के लिए जे सी कुमारप्पा ने अर्थव्यवस्था को पांच प्रकारों में वर्गीकृत किया: परोपजीवी अर्थव्यवस्था (अन्य मनुष्यों को शिकार करना); शिकारी अर्थव्यवस्था (दूसरों के उत्पादन को शिकार करना); उद्यमी अर्थव्यवस्था (अपनी खुद की आवश्यकता का उत्पादन करना); समानतावादी अर्थव्यवस्था (सबके भले के लिये) और सेवा अर्थव्यवस्था (निःस्वार्थ दृष्टि से दूसरों की सेवा)५

गॉंधीवादी अर्थव्यवस्था नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति पर आधारित है| उन्होंने महसूस किया कि अर्थव्यवस्था को ‘समानतावादी’ उद्देश्य के साथ ‘सेवा अर्थव्यवस्था’ की भावना और ‘उद्यमी अर्थव्यवस्था’ के माध्यम से निर्देशित किया जाना चाहिए|

सर्वोदय

अर्थव्यवस्था मानव समर्थक होने के लिए जीवन के सिद्धांतों के आधार पर निर्देशित किया जाना चाहिए; जॉन रस्किन की ‘अन टु धिस लास्ट’ किताब से प्रेरित हो कर, गॉंधीजी ने तीन बुनियादी सिद्धांतों का प्रस्ताव रखा:

सबकी भलाई में हमारी भलाई निहित हैं|

वकील और नाई दोनों के काम की कीमत एक सी होनी चाहिये, क्योंकि आजीविका का अधिकार सबको एक समान है|

सादा मेहनत-मजदूरी का, किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है|६

जे सी कुमारप्पा ने इन सिद्धांतों को अपनी किताब ‘गॉंधीवादी आर्थिक विचार’ में स्पष्ट करते हुए निम्न प्रकार का अर्थ प्रस्तुत किया|

जिंदगी का व्यक्तिगत स्तर पर अनुभव होता है, इसलिए व्यक्ति की भलाई प्राथमिक है|७

जैसा कि जीवन केवल आपसी समर्थन (सामाजिक जीवन) द्वारा ही संभव है| कुमारप्पा का तर्क है कि लोगों के बीच एक सुव्यवस्थित सहयोग के द्वारा ही उनका आर्थिक जीवन संभव होता है|

सभी इंसान समान हैं|८

हर इंसान को जीने का समान अधिकार है, इसलिए आजीविका के लिए; प्रत्येक व्यक्ति के कार्य का मूल्य समान होना चाहिए|९

जब व्यक्तियों को दी जानेवाली आजीविका के साधन न्यायसंगत होते है, तब समानता का आविर्भाव बेहतर होता है|

सामग्री की पूर्ति के लिये शारीरिक श्रम करना यह न्याय और समानता का सिद्धांत है| शारिरीक श्रम के माध्यम से व्यक्ति उतना ही कमा सकता है जितनी उनकी जरूरत होती है| इससे समानता का सिद्धांत प्रतिपादित होता है| और समानता आधारित एक सहज सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित किया जाता है|

गॉंधीजी के मूल सर्वोदय सिद्धांतों में उपरोक्त प्रस्तावों की झलक दिखायी देती है|

रस्किन ने व्यक्ति की शारीरिक जरूरतों को अर्जित करने के साधन के तौर पर मानव शरीर को प्रस्थापित किया|

जब शारीरिक श्रम किसी की आजीविका अर्जित करने का साधन बन जाता है, तब तरक्की और अस्थिरता के परिणाम स्वरूप अमीर और गरीब के बीच निर्माण हुई खाई व्यावहारिक रूप से समान करना असंभव हो जाती है|१० शारीरिक श्रम और उच्च गुणवत्ता युक्त जीवन के बीच एक पारस्परिक संबंध है|

जीवन शरीर, मन और आत्मा का सामंजस्य है| ‘स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का वास’ ही सफल जीवन की निशानी मानी जाती है| इसलिये स्वस्थ शरीर का मुख्यतः आधार शरीर की सक्रियता पर निर्भर करता है| इस संदर्भ में सर्वोदय सिद्धांत में दर्शाया गया शरीरश्रम का तत्त्व मूल्यों की नींव पर सार्थक ठरता है|

तीसरा सिद्धांत उपरोक्त प्रस्तावों का प्रतिनिधित्व करता है| इससे अधिक और भी कहा जा सकता है| जैसे गॉंधीजी ने कई बार उद्धृत किया है कि, ‘पृथ्वी हर मनुष्य की जरूरत को पुरा कर सकती है पर किसी एक व्यक्ति की लालच को नहीं|’ यह एक और प्रस्ताव है जो सर्वोदय के तीसरे सिद्धांत में उनका मर्म दर्शाया गया है| भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए शारीरिक श्रम की निर्भरता, व्यक्ति की अधिक हासिल करने की लालच को रोकता है| और इस प्रकार प्रकृति के प्रचुर संसाधनों को अतिक्रमण से बचाया जाता है| साथ साथ पृथ्वी पर स्थित जीवों के बीच पारस्परिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है| जे सी कुमारप्पा ने शारीरिक श्रम आधारित अर्थव्यवस्था को ‘मौजूदा अर्थव्यवस्था’ कहा था| यह बहती हुई नदी की तरह है जो यांत्रिकृत उत्पादन के द्वारा निर्मीत शोषण के खिलाफ समाज का पालन पोषण निरंतर रुप से करती रहती है|११

मन के बारे में गॉंधीजी ने कहा, ‘मन या बुद्धि सामाजिक कल्याण के लिए और आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए है, उनका सही उपयोग होना चाहिये|

कुमारप्पा चिंतित थे कि बुद्धिमता का पागलपन भरे उपयोग के द्वारा धन और शक्ति का बड़े पैमाने पर केंद्रीकरण होता है| और केंद्रीकरण द्वारा प्राप्त विकास ‘कैंसर विकास’ कहलाता है| इस विकास के द्वारा प्रकृति और सहजीवी मनुष्यों का बेरहम शोषण होता है और पृथ्वी को नुकसान पहुंचाता है| इससे बड़ा खतरा यह है कि सामाजिक स्तर पर समाज में अमीर और गरीब जैसी अविभाज्य असमानता स्थापित करता है|१२

यह केवल शारिरीक रूप से जीवन के बारे में ही नहीं है| प्रकृति ने मनुष्य के लिये जीवन बनाया है वैसा ही सभी प्राणियों के लिये भी बनाया है| प्रकृति का नियम सभी के लिये एक है, और वह नियम प्रकृति के अनुरूप जीने के लिये मार्गदर्शन करता है|१३ उनके उलंघन से अप्रत्याशित, अपरिवर्तनीय प्राकृतिक परिणाम होते हैं, जैसे कि जलवायु परिवर्तन| अगर हम प्रकृति के नियम के अनुरुप हमारी जीवनपद्धति को स्थापित करते है तो उनको नष्ट किये बिना विकसित हो सकते हैं|

जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिये कुछ नियम हैः

अपने विचारों, शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखें|१४

समाज के सभी घटकों के साथ मिलकर जीवन जीने की पद्धति१५

प्रकृति के कानून व अहिंसा के साथ जीवन को संगठित करें|१६

पहला नियम व्यक्ति को एक ईमानदार व्यक्ति बनाता है| पहले और दूसरे के द्वारा व्यक्ति को आदर्श सामाजिक अस्तित्व प्रदान करता है| तीनों साथ में होते ही व्यक्ति के जीवन को पूरी तरह से अहिंसक और सच्चा बनाते हैं|

गॉंधीजी ने इसे ‘सर्वोदय’ कहा, जिसका मतलब है कि सभी का कल्याण| ऐसा जीवन किसी का भी शोषण नहीं करता, विशेष रूप से प्रकृति का बिलकुल नहीं| और प्रकृति का स्वरूप प्रकृति को पर्याप्त रूप से पुनः निर्माण की अनुमति देता है| और प्रकृति अपनी व्यवस्था को अपने सिद्धांत के आधार पर निभाती है| इसी आधार पर जे सी कुमारप्पा ने इसे स्थायी अर्थव्यवस्था कहा|

इसको सार्थक करने के लिये कुमारप्पा ने राष्ट्रीय या वैश्विक अर्थव्यवस्था से विपरीत स्थानीक अर्थव्यवस्था यानी की ‘ग्रामोद्योग’ का प्रस्ताव प्रस्तुत किया| इस अर्थव्यवस्था में लाभ या धन संग्रह की भावना नहीं, बल्कि जीवन को पारस्परिक रूप से बनाये रखने के लिये उत्पादन करता है|१७ इस अहिंसक आर्थिक व्यवस्था को ट्रस्टीशीप और विकेन्द्रीकरण के सिद्धांतो द्वारा निर्देशित किया गया है|१८ इस आर्थिक व्यवस्था में उपकरण और यंत्र उपयुक्त होंगे, कुमारप्पा ने इसे अहिंसक मशीनरी कहा है|१९

इस तरह कि अर्थव्यवस्था में ज्ञान, जागरूकता और जिम्मेदारी की भावना का उचित वितरण आवश्यक है|२० समाज में ऐसे अनुशासन स्थापित करने का प्रयास भी सत्याग्रह का हिस्सा है| इस सम्बन्ध में कुमारप्पा ने राष्ट्र के लिये ‘अहिंसक योजना’ का प्रस्ताव दिया था|

सन्दर्भ -

१) जे. सी. कुमारप्पा, गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट्, सर्व सेवा संघ, प्रकाशन वाराणसी, पृ. सं. २ व ४; २) जे. सी. कुमारप्पा, गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट्, सर्व सेवा संघ, प्रकाशन वाराणसी, पृ. सं. २ व ४; ३) जे. सी. कुमारप्पा, गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट्, सर्व सेवा संघ, प्रकाशन वाराणसी, पृ. सं. २ व ४; ४) एस. के. ज्योर्ज एवं जी. रामचंद्रन, द एकोनॉमिक्स ऑफ पीस, अखील भारत सर्व सेवा संघ, वर्धा, पृ. सं. ६४;

५) जे. सी. कुमारप्पा, इकोनॉमी ऑफ परमनन्सः पृ. सं. १२; ६) मो. क. गॉंधी, सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, पृ. सं. २६०; ७) जे. सी. कुमारप्पा, गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट्, सर्व सेवा संघ, प्रकाशन वाराणसी, पृ. सं. ५०-५१; ८) गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट् पृ. सं. १५; ९) मो. क. गॉंधी, मंगल प्रभात; १०) गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट् पृ. सं. ८; ११) गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट् पृ. सं. , ५०; १२) दि इकोनॉमिक्स ऑफ पिस, पृ. सं. ६५; १३) मो. क. गॉंधी, मंगल प्रभात; पृ. सं. १२-१३; १४) गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट् पृ. सं. ५३; १५) इकोनॉमि ऑफ परमनन्स, पृ. सं,. १३; १६) गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट् पृ. सं. २७; १७) गॉंधीयन इकोनॉमिक थोट् पृ. सं. ३१-३३; १८) इकोनॉमि ऑफ परमनन्स, पृ. सं, ९५; १९) इकोनॉमि ऑफ परमनन्स, पृ. सं,. १३१; २०) दि इकोनॉमिक्स ऑफ पिस, पृ. सं, ९७;

 

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