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Articles - लाल नील

भारतीय स्वतंत्र संग्राम का इतिहास विश्व के लिए प्रेरणा का इतिहास रहा है| शायद ही ऐसा कोई देश होगा जिन्होंने अहिंसा के तत्व के आधार पर स्वतंत्रता प्राप्त किया हो| गॉंधीजी की पद्धति अद्वितीय थी, रचनात्मक कार्य के माध्यम से उन्होंने व्यक्ति को खड़ा करने का प्रयास किया, भारत में इनकी शुरूआत चम्पारण से हुई| अंग्रेजों के द्वारा किये गये दमनकारी कानूनों के खिलाफ सत्याग्रह का अमोध हथियार ने चम्पारण की रैयत में अद्भुत जागृति का संचार किया| किसान नीलहरों का त्रास भूल गये और निर्भय होकर गॉंधीजी को अपनी दुख गाथा सुनाने लगे| सत्याग्रह के संघर्ष का हेतु लोगों के अन्दर से कायरता निकालकर पौरुष भरना और सच्चे मनुष्यत्व को विकसित करना है| चम्पारण सत्याग्रह ने यह दृढ्ढ रुप से सार्थक कर दिखाया| - सम्पादक

नील और चम्पारण

१७७७ ई. में सर्वप्रथम लुई बन्नों नामक एक फ्रांसिसी ने बंगाल सूबे में नील की खेती की शुरूआत की थी| १७७७ के पूर्व अंग्रेज और फ्रांसिसी व्यापारी भारत से नील ले जाकर दूसरे देशों को बेचते थे| लेकिन नील की खेती में पूंजी लगाने की चेष्टा अठारहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में ही की गयी| लुई बन्नों के कार्य से प्रोत्साहित तथा नील के व्यवहार में भारी मुनाफे को देखते हुए कैरल ब्लूम नामक एक अंग्रेज व्यापारी ने १७७८ ई. में सर्व प्रथम नील की कोठी खोली तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सूचित किया कि नील की खेती बड़े मुनाफे का साधन बन सकती है| कैरल ब्लूम ने तत्कालीन गवर्नर जनरल को भी एक स्मृति पत्र भेजा, जिसमें बड़े पैमाने पर नील की खेती करने का अनुरोध किया गया|

बिहार में नील उद्योग को प्रारंभ करने का श्रेय तिरहुत व दरभंगा के कलक्टर फ्रैंकॉस (१७८२-१७८५) को जाता है| भारत तथा भारत के बाहर १८ वीं शताब्दी में नील की मॉंग बहुत थी| उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि के साथ कपड़ों के उत्पादन में लगभग १० से १२ गुना की वृद्धि हुई| इससे कपड़ों में दी जाने वाली नील की मात्रा बढ़ी और मात्रा के बढ़ने से नील की मॉंग बढ़ी| ब्रिटेन के अलावा भारतीय नील इटली, फ्रांस, अमरीका, आस्ट्रेलिया, मिस्र तथा फारस आदि देशों में भेजी जाती थी| नील की मॉंग से भारी मुनाफे को ध्यान में रखकर कम्पनी ने निलहे साहेबों को जन्म दिया, जो अपने शोषण और अत्याचार के लिए चम्पारण ही नहीं सम्पूर्ण भारतीय इतिहास को कलंकित किया|

नील की खेती की तीन कठिया जोत-प्रथा

चम्पारण में तीन कठिया प्रथा का प्रचलन सबसे अधिक था| इस प्रथा के अन्तर्गत कोठीवाले रैयतों से उनकी एक निश्चित भूमि पर नील की खेती करवाते थे तथा बदले में एक निश्चित रकम उन्हें देते थे| १८६० ई. तक एक बीधा जमीन में ५ कट्ठा नील की खेती के लिए भूमि निश्चित की जाती थी, परन्तु १८६७ ई. के आस पास ५ कट्ठे भूमि के स्थान पर एक बीघे में तीन कट्ठे भूमि पर नील की खेती की जाने लगी| तभी से इस प्रथा का नाम तीन कठिया पड़ा|

चम्पारण सत्याग्रह और राजकुमार शुक्ल का प्रयास

राजकुमार शुक्ल ने महात्मा गॉंधी को चम्पारण लाने तथा निलहों के विरुद्ध रैयतों की मुक्ति दिलाने के जॉंच कार्य में महात्मा गॉंधी को सहयोग देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी| आरम्भ से ही राजकुमार शुक्ल नीलवरों से नाखुश थे| एक बार उन्होंने अपने कोले में आलू की खेती की| आलू की फसल तैयार हो जाने पर बेलवा कोठी के दरिन्दों ने आधी फसल राजकुमार शुक्ल से कोठी को दे देने के लिए कहा तो इन्होंने कहा कि घर और कीले की लगान सरकार की तरफ से माफ है| अतः किले की उपज पर मेरा पूरा अधिकार क्यों नहीं| बेलवा कोठी के मैनेजर ने यह जानकर कि अन्य किसान भी देखा-देखी में बागी हो जायेंगे, इसलिए कारिन्दों को लेकर राजकुमार शुल्क के पास गया| शुक्ल जी को डराया, धमकाया गया, परन्तु जब वे विचलित नहीं हुए तो इनके घर का सारा सामान नष्ट कर झोपड़ी उजाड़ दी गयी| इसी समय उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक निलही कोठी के गोरे साहबों के अत्याचारों से चम्पारण के किसानों को मुक्त नहीं कर लूंगा, चैन की सांस नहीं लूंगा| इसी समय वे गॉंवों में घुमघुमकर गुप्त सभाओं द्वारा निलही कोठी के गोरों के खिलाफ प्रचार करते और उदासीन ग्रामवासियों को एक जुट होकर अत्याचार के विरुद्ध सर उठाने के लिए ललकारने लगे| राजकुमार शुक्लजी का यह प्रयास छिपा न रहा| मैनेजर ने चिढ़कर शुक्लजी के विरुद्ध एक मुकदमा दायर कर दिया कि इन्होंने खेत में मछलियॉं पकड़ी हैं| उस समय अपने खेत में भी मछली पकड़ना अपराध माना जाता था| शुक्लजी को तीन सप्ताह की जेल हुई|

जेल से निकलने के पश्चात वे और जोर से निलहों के विरुद्ध कार्य करने लगे| पटना के किसी समाचार पत्र ने उनके लेख को नहीं छापा तो वे कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले और विद्यार्थीजी ने प्रताप समाचार पत्र में उनका लेख चम्पारण की दुर्दशा छापा और आगे भी छपवाने का वचन दिया|

राजकुमार शुक्ल द्वारा चम्पारण के अत्याचारी निलहों के खिलाफ अभियान के दौरान उन्हें आभास हुआ कि जिस काम को समाप्त करने का बीड़ा उन्होंने उठाया है, वह किसी असाधारण पुरुष की सहायता के बिना पूर्ण नहीं हो सकता| दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह की चर्चा के साथ उन्होंने गॉंधीजी का नाम सुन रखा था|

हालांकि चम्पारण के नीलवरों और उनके रैयतों के सम्बन्ध की जॉंच के विषय में अपनी बात उपस्थित करने से पूर्व ही राजकुमार शुक्ल लोकमान्य तिलक के पास गये और चम्पारण के किसानों के दुःख को दूर करने की प्रार्थना की| परन्तु उन्होंने देश की राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रश्न को प्रमुखता प्रदान कर इसे बाद में देखने की बात कही| इसके पश्चात राजकुमार शुक्ल पं. मदन मोहन मालवीयजी के पास गये| लोकमान्य की ही भॉंति उन्होंने भी चम्पारण की समस्या को गौण और भारत की स्वतंत्रता के लिए जाने वाले कार्य को प्रमुखता दी| महात्मा गॉंधी विभिन्न प्रान्तों से आये प्रतिनिधियों के कैम्प के बगल में ठहरे थे| राजकुमार शुक्ल उनके पास गये| गॉंधीजी की सौम्यता व सादगी से प्रभावित हो, आँख में आँसू भर राजकुमार शुक्ल उनके चरणों पर लेट गये और भरे गले से उन्होंने कहा निलहों के जुल्म से चम्पारण के रैयतों को बचाइये|

अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषि व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किये जाने से देश के कृषि जगत में हलचल पैदा हो गयी तथा भारतीय कृषक निर्धनता की बेड़ियों से जकड़ गये| चम्पारण उनका ही एक उदाहरण है| चम्पारण में उत्पन्न होनेवाली नील सदियों से किसानों के रक्त का लाल दाग रही है| गॉंधीजी की सत्याग्रह पद्धति न केवल उनके बंधनों को तोडने में सार्थक हुई बल्कि पूर्ण स्वराज्य की और ठोस कदम बढाने में भी कारगर सिद्ध हुई|

गॉंधीजी की पद्धति

गॉंधीजी कहते हैं ‘मेरे पास दूसरा कोई साधन नहीं है| बस, एक ही रास्ता है सत्याग्रह| अब तक मैंने सत्याग्रह का भीषण स्वरूप देश के सामने उपस्थित किया है; इसमें सहयोगी, असहयोगी, कट्टर, हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, यहूदी सब शामिल हो सकते हैं|’१ सत्याग्रह केवल सरकार के विरुद्ध ही नहीं किया जा सकता, वह किसी भी अनीतिपूर्ण स्थिति में किसी के भी विरुद्ध किया जा सकता है| अतएव इसके उदाहरण के तहत हम देखते हैं तो चम्पारण में अनीति आधारित व्यवस्था के खिलाफ सत्याग्रह चलाया, अहमदाबाद में धनिकों के विरुद्ध सत्याग्रह चलाया और खेड़ा में सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह चलाया| ‘सत्याग्रह के लिए दोनों पक्षों का सत्याग्रही होना जरूरी नहीं है| यदि एक पक्ष सत्याग्रही बना रहे तो अन्त में विजय सत्याग्रह की ही होती है|’२ युद्ध कि स्थिति दोनों पक्षों के लिए आंसू सारने जैसी स्थिति होती है| उसमें हारने वाला तो रोता ही है किन्तु जीतने वाला भी रोता है| इस दृष्टि से देखा जाये तो युद्ध कि स्थिति सुखकर नहीं है| किन्तु सत्याग्रह इससे विपरीत है, इस स्थिति में जीत किसी पक्ष की नहीं किन्तु सत्य की होती है| और सत्य की जीत किसी के लिए पीडादायक नहीं होती| कष्ट सहन की लड़ाई में जितना कष्ट सहना पडे उतना शुद्ध होते है|

पर अफसोस, एक शतक तक, बंधुआ का अभिशाप किसानों के जीवन को अंधकारमय बनाकर उनका गला घोटता रहा| वे अपने स्वयं से विमुख हो गये थे, क्योंकि कृषि पूंजीगत और बाजार द्वारा संचालित हो रही थी| और यह पद्धति पारंपरिक पद्धति से खेती करने वाले तथा सीमांत किसान के लिए बिलकुल नई व पश्चिमी ढंग की थी| गॉंधीजी ने देश के केंद्र के रूप में गॉंवों को स्थान दिया, क्योंकि गॉंव ही तो राष्ट्र को महत्वपूर्ण अन्न प्रदान करता है| किसानों की आजादी की यात्रा को सिद्ध करने के लिए उन्होंने सो साल पहले चम्पारण में रचनात्मक कार्य की शुरूआत की थी| उनके द्वारा किए गये प्रयास हमारे लिए एक प्रेरणा की मिसाल बना|

लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि किसान और कृषि से सम्बन्धित किसी भी तरह की अशांति अब नहीं फैलनी चाहिए| देश में कृषि सम्बन्धित कई अनुसंधान हो रहे है, लोगों में सामाजिक जागृति का संचार हो रहा है| इसलिए अब सीमांत किसानों के स्तर पर भी हम कृषि को टिकाऊ बना सकते है| इसके लिए प्रत्येक गॉंव में कृषि से सम्बन्धित बुनियादी ढांचे का निर्माण और सरलता से प्राप्त आर्थिक स्रोत, तकनीक, बाजार के साथ सरल संपर्क, न्यूनतम मूल्य की नीति, फसल बीमा, किसानों के लिए पेंशन योजना जैसे प्रावधानों की मौजूदगी होना अनिवार्य है|

दुनिया को हमारे किसानों के संदर्भ में असीम कष्ट के पर्याय में लाल (रक्त) का प्रयोग नहीं होना चाहिए| और यह केवल कृषि में निष्पक्ष और अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के संदर्भ में तो हरगिज नहीं|

अगर ऐसा कर पाते तो यही राष्ट्रपिता को उचित समर्पण होगा|

सन्दर्भ -

१) हिन्दी नवजीवन, ७-९-१९२४; २) सत्याग्रह, प्रधान सम्पादक श्रीरामनाथ सुमन; ३) चम्पारण में महात्मा गॉंधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद; ४) चम्पारण में बापू ब्रिजकिशोर सिंह; ५) सम्पूर्ण गॉंधी वाड्मय खंड १३-१४

 

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